Wednesday, February 6, 2013

एक प्याली चाय की..


एक प्याली चाय  थी
कुछ जाने पहचाने लोग थे
कुछ बीती बातें थी
वही पसंदीदा ठिकाना था
और मैं थी
क्या मैं ही थी ?
अत्यंत शांत, मंद व स्थिर
क्या मैं ही थी ?
सदैव वाद-विवाद मे उलझने वाली
सभी के ताल मे ताल मिलाने वाली
क्या मैं ही थी ?
महज़ एक श्रोता बन कर बैठी थी
कभी राजनीति, कभी रिश्ते तो कभी समाज की बातें
कभी धन दौलत, कभी मनोरंजक तो कभी अभिमान की बातें
जीतने प्रकार के लोग, उतनी प्रकार की बातें
मेरे मन मस्तिष्क मे थी ना जाने कितने ही प्रकार की बातें
मगर मैं कही और , कहीं किसी और के साथ खोई हुई थी..
ये तो वही लोग थे जिनके साथ मैं कभी ठहाके लगाया करती थी
मगर पता नही क्यू, मैं कहीं किसी ओर के साथ खोई हुई थी
वो प्याली चाय की ठंडी हो गयी
और सब अपनी अपनी राह को निकल लिए..
मैं अब भी कहीं किसी और के साथ खोई हुई थी..

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