एक कविता लिखने की चाह थी
अक्षर बिखरे परे है मेरे सामने
कुछ खुली किताबें, कुछ दबे ज़ज्बात
उनको प्रस्तुत करने की चाह थी
एक सुनहरे सपने मे जीने की चाह थी
हर दिन खुद से पूछती
हर सूरज से बातें करती
खुद ही मे खुश रहने की चाह थी
एक नया सवेरा देखने की चाह थी
जब देखा हिमालय को उस दिन
जब देखी नदियों को बहेते हुए
मुझे भी उस शिखर से बह जाने की चाह थी
एक नयी दुनिया मे जाने की चाह थी
जब देखा उस प्रशांत जल समूह को
साहिल से टकराते और बिखरते उन लहरों को
उस साहिल मे खो जाने की चाह थी
कुछ शब्द प्रस्तुत करने की चाह थी
उनको आकार देने की चाह थी
कुछ नयी दूरी तय करने की चाह थी
एक कविता लिखने की चाह थी....
No comments:
Post a Comment