Wednesday, April 9, 2014

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वक़्त की कमी अब आखों मे झलकती है
अब तो जिंदगी अपना आँचल भी झटकती है
मुट्ठी से जैसे रेत फिसल जाता है
साहिल से जैसे समंदर छूट जाता है
माँ के आँचल मे किसी बच्चे ने दम तोड़ा है
रंग ने जैसे मेहंदी का साथ छोरा है
आँखों ने जैसे उन्हे देखने का आस छोरा है
मुस्कुराहट के बिना इन होठों का  अब क्या काम
क्या फ़र्क पड़ता है अगर हम हो भी जाए बदनाम
एक आस पर साँसे नही चलती है
एक एहसास पर जान अब अटकी है
मुसाफिरो जैसा मंन मेरा भटकता है
जिस्म त्याग देने को हर पंछी अब कहता है
जीवन की लॉ बुझाए नही बुझती है
ना जाने किनकी दुआओं से रोशन वो रहती है

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